आज मेरे दोस्त ने छेड़ा क्यों भाई “चॉकलेट डे” पर तो बहुत लिखा, जनसंख्या दिवस पर नहीं लिखोगे? लिखा तो था, पर मन नहीं कर रहा था भेजने का, यहाँ बुद्धिजीवियों से डर लगता है, न जाने किस शब्द  को पकड़ लें, क्योंकि शब्दों की अपनी दुनिया है, और हर शब्द का अपना एक अर्थ , साथ ही उसके उपयोग और सोच के अनुसार मायने बदल जाते हैं, खैर, जनसंख्या और महंगाई कोई समस्या नहीं सिर्फ समझ का फेर है, जिसने इसको अपनी ‘शक्ति’ बनाया वो दुनिया में अपना लोहा मनवा रहा है, और जिसने ‘समस्या’ बनाया वो वोट पा रहा है। जनसंख्या का उपयोग उत्पादकता बढ़ाने में लगाया जाए तो अर्थशास्त्र के सिद्धान्त “उपभोगतावाद” याने मांग ज्यादा माल कम तो महंगाई बढ़ेगी से बचा जा सकता है ,इसलिए दोनों समस्या हैं ही नहीं सिर्फ हमें अपनी सोच को बदलना होगा।

दुनिया गोल है और ये जनसंख्या का खेल चलता रहेगा। 1804 में हम 100 करोड़ थे और ये 100 करोड़ होने में हमें लगभग 02 लाख वर्ष
लगे
, परंतु उसके बाद  इसकी गति बढ़ी और हम लगभग 15 बर्ष में दोगुने के रेट से बढ़ने लगे, जब तक  जनसंख्या 100-200 करोड़ तक थी, तब तक ठीक था, परंतु जब सन 1989 में यह 500 करोड़ पर पहुंची तो दुनिया का ध्यान इस ओर गया और 11 जुलाई 1989 को UNO ने इसे “ विश्व जनसंख्या दिवस” घोषित किया, उस समय  जनसंख्या का ग्रोथ रेट 1.79% था, परंतु सभी देश ने से गंभीरता से लिया तो आज ये घट कर 1.09% हो गई, अर्थात 0.7% की कमी दर्ज की गई अर्थात हमने मिलकर उसपर नियंत्रण कर लिया। आज कोई इसकी अधिकता से परेशान तो कोई कमी से, रूस, जापान जैसे देश अपने नागरिकों को जनसंख्या बढ़ने के लिए कई प्रलोभन दे रहे है, और हम कम करने के लिए। कहा जाता है की हम जनसंख्या में कुछ बर्षों में दुनिया में 01 नंबर हो जाएंगे, इसके कई कारण हैं,जिसमें मृत्यु दर कम होना, अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था, अन्न के मामले में आत्मनिर्भरता इत्यादि अर्थात हम जनसंख्या के साथ भी विकास कर रहे हैं। जिस प्रकार चीन ने अपनी जनसंख्या का धनात्मक उपयोग कर अपना ग्रोथ रेट 8.72 किया और  वह जल्दी ही प्रति व्यक्ति आय में अमेरिका और ब्रिटेन की बराबरी कर लेगा, तो हम क्यों नहीं कर सकते ? हमें इसे अभिशाप न मानकर, देश की प्रगति का सौपान मानना होगा ।

दुनिया गोल है और कहते भी तो हैं न “कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर” 1980 के दशक में अमेरिका में 20 से 30 बर्ष के युवा अधिक थे इसलिए उसकी चौधराहट चरम पर थी, परंतु आज उसके देश में युवा सिर्फ 14.6% हैं, इसलिए वह परेशान है, इसी प्रकार की स्थिति आज रूस, जापान की भी है, अत: पूरी दुनिया को इसको एक अनुसंधान का बिषय मानना होगा, जिससे हम जनसंख्या कम या ज्यादा की स्थिति में आने वाली परेशानी से बच पाएँ,आंकड़ों की समीक्षा होनी चाहिए और उस आधार पर फेमली प्लानिंग के फार्मूले बनना चाहिए, जिससे इस स्थिति से बचा जा सके,  हमारी “वसुधैवकुटुंबकम” की अवधारणा पर भी बिचार होना चाहिए, क्यों नहीं रूस, जापान जैसे देश अपने दरबाजे खोलें और मानक नियम कानून के आधार पर अधिक जनसंख्या वाले देश से नागरिकों का आदान प्रदान करें जिससे वहाँ की  बेरोजगारी की समस्या का हल होगा और उन्हें काम काजी हाथ मिलेंगे, जो उस देश के बुजुर्ग हो रहे नागरिकों के काम में मदद करेंगे जिससे वहाँ की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मेरे अनुसार दुनिया के अधिक जनसंख्या वाले देशों को भी आर्थिक उन्नति के नाम पर बहुत ज्यादा कल-कारखानों पर आश्रित न होकर आवश्यकता के अनुरूप ही आधुनिकीकरण पर ज़ोर देना चाहिए, जहां तक संभव हो नैसर्गिक संसाधन का उपयोग कर नागरिकों को काम देना प्राथमिकता होना चाहिए, नहीं तो आर्थिक असमानता अपराध को जन्म देती है। विदेशों के खान-पान, रहन-सहन की जगह प्रयास करना चाहिए की आम जनता देश की पारंपरिक पौशाक और खाने पर ज्यादा ध्यान दे, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

अत: आज विश्व को  इस  “विश्व जनसंख्या दिवस” पर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर रिसर्च करना चाहिए, कि हम किस प्रकार इस जनसंख्या रूपी “जनबल” का सार्थक और समान उपयोग करें, जिससे वर्तमान और भविष्य में यह समस्या न होकर हम सभी के लिए वरदान सिद्ध हो।

 

राकेश चौबे