अक्सर विदाई के वक्त हमने लोगों को कहते सुना है “यह हमारी बहू नहीं बेटी है……., हम बहू नहीं बेटी ले जा रहे हैं….., यह हमारे घर में हमारी बेटी जैसी रहेगी “….. वगैरह….
लेकिन क्या यह सच है?
बिल्कुल नहीं। जमाना भले ही मॉडर्न हो गया हो मगर हर परिवार बहु से कुछ उम्मीदें जरूर रखता है। हर किसी को पढ़ी-लिखी, सुंदर, सर्वगुण संपन्न, बहू चाहिए, जो धार्मिक भी हो, अच्छा खाना भी बनाती हो, कामकाज में निपुण हो, ससुराल में सब की सेवा करें, आसानी से हर माहौल में ढल जाए, सारे तौर-तरीके सीख जाए यानी ऑल राउंडर बहू चाहिए जिसमे सब की सुविधा के हिसाब से सारे गुण होने चाहिए। हर परिवार मे बहू से उम्मीद की जाती है कि वह सिर पर पल्लू रखें जो कि उसके संस्कारों का सूचक है और सब के प्रति मान-सम्मान दर्शाता है। बहु के स्वभाव में नमृता हो, वह धीमे स्वर में बात करें। यदि वह कुछ नया करना चाहे तो सबकी सलाह ले, दूसरे शब्दों में कहें तो सब की परमिशन ले। पुरानी मान्यताएं जो घर में सदियों से चली आ रही हैं उनको माने।

क्या यह सारी बातें बेटी के लिए जरूरी होती है?
नहीं ना !
इसलिए मेरे हिसाब से तो बहू बहू होती है और बेटी बेटी होती है ।
बहू से यह आशा की जाती है कि वह सास ससुर को अपने माता-पिता की तरह समझे परंतु क्या सच में बहु ऐसा कर पाती है ? एक बेटी होते हुए अपने माता-पिता को किसी गलत बात के लिए रोक सकती है, कुछ ना पसंद आने पर टोक सकती है, अपनी सलाह दे सकती है, उनकी बातों को ना मानकर खुद की मनमर्जी कर सकती है परंतु जब वह एक बहू होती है तो वह ना चाहते हुए भी सारी बातों को मानकर सबकी हाँ मे हाँ मिलाती है । अगर वह ऐसा ना करें तो फिर शायद हमारे समाज के हिसाब से वह अच्छी बहू नहीं है ।
यह सारी बातों को देखकर मुझे ऐसा लगता है कि यह सिर्फ एक भ्रम है की बहू और बेटी में कोई फर्क नहीं है।
बहू हमारे घर में बेटी बनकर रहेगी ऐसा कहने वाला परिवार उसी बहू से यह उम्मीद करता है कि वह सुबह जल्दी उठकर नहा-धोकर पूजा करके ही रसोई में जाएं। क्या वही परिवार अपनी बेटी से भी यही आशा करता है? बेटियों के लिए भी यही नियम लागू करता है ? मेरे अनुसार तो ऐसा नहीं होता है। बेटी चाहे कितने भी जवाब दें अभी बचपना है कहकर टालने वाले मां-बाप बहू के कुछ कहने पर उसे असंस्कारी कहने लगते हैं। बेटियों को हर तरह के कपड़े पहनने की इजाजत देने वाला परिवार बहुओं को साड़ी और पल्लू में ही देखना पसंद करता है ।

क्या सिर्फ पहनावे और पल्लू से ही संस्कार और बड़ों का सम्मान दर्शाया जा सकता है ?
मैं यह नहीं कहती कि सारे नियम और कायदे गलत है परंतु यह भी नहीं कह सकती कि सारे नियम सही हैं।
कभी-कभी लगता है कि लोग सिर्फ शब्दों में और बातों में ही खुद को बदलते हैं , रियल लाइफ (वास्तविकता )मैं नहीं ।
यह तो घर-घर की कहानी है ।
जब दुनिया बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं रख रही है तो बहू और बेटी में क्यों?

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