बहुत पुरानी बात है, जब हम बच्चे थे नानी दादी के घर जया करते थे तो वे हमें समझाया करती थी बेटा किसी की बात नहीं सुन्ना, उसकी आँखों में आँखों डाल कर बात नहीं करना,वो तुमको बहका सकता है, गलत काम करवा सकता है, ध्यान रखना, आदि आदि ………

          आज जब इस “´ब्लू व्हेल “ का नाम सुना तो गावों की वो कहानी याद आ गई जब बच्चों को बहला फुसला कर लोग पकड़ लेते थे या कहें अगवा कर लेते थे और उनसे अपने अनुसार काम कराते थे, जैसे भीख मंगवाना, चोरी कराना आदि, याने सब कुछ वही चल रहा है जो पहले भी हुआ करता था अंतर इतना है कि वक्त के साथ अपराधों का विस्तार हो गया है और प्रसारण माध्यम के प्रचार प्रसार के कारण चिंदी को भी आसानी से साँप बनाया जा रहा है।

          पहला प्रश्न यह कि बच्चे ब्लू व्हेल खेलने से आत्म हत्या कर रहे हैं, तो बच्चे उसे  प्राप्त कर रहे हैं, उसकी स्टेप को पूरा भी कर रहे हैं और माँ पिता को इसकी जानकारी तक नहीं , क्या बच्चों की स्वतन्त्रता की आड़ में माँ पिता अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के साथ साथ खुद को स्वतंत्र रखना चाहते हैं?

          दूसरा प्रश्न है कि बच्चे उस गेम को चेलेंज के रूप में ले कर खेल रहे है, वे अपने आप को हीरो सिद्ध करना चाहते हैं जो किसी हद्द तक उम्र के लिहाज से जायज है परंतु जो लोग इस गेम को खिला रहे हैं वे कौन है और उनका मकसद क्या है? क्या वे विकृत मानसिकता के प्रतीक हैं यदि ऐसा है तो उनको खोजना और सजा देना सरकार का काम है।

अस्तु यदि परिवार, समाज के बीच आपस का प्यार, सम्मान हम खोते रहेंगे तो सामाजिक अपराध बढ़ते रहेंगे ।